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Vo Chupaarustam (वो छुपारुस्तम)

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वो छुपारुस्तम   बहन उसे डराए कभी जो , तो कहते बहन को सब माँ दुर्गा। और वो कभी डराए बहन को, सब कहते उसे अत्याचारी मामा कंस।  पर वो हैं छुपारुस्तम , वो तो है मनसे हंस।  ना दिगई उसे कोई आज़ादी , सबके सामने रोनेकी।  उसे तो दिया गया , सिर्फ और सिर्फ आजीवन मेहनत करने का दंड।  पर वो हैं छुपारुस्तम , रखता वो इस सबको अपने मनमे बंद।  कह नहीं सकता किसीको "मुझे बच्चोको सँभालने जाना हैं ", हसी उड़ायेंगे दफ्तरमे सब।  आज पूरी दुनिया करती हैं , बचपनसे माँ - माँ।  पर वो हैं  छुपारुस्तम , ऐसेही नहीं मिलती सबकी वाह-वाह।  कोई मानेगा इसको की , अत्याचार उसपे भी होता हैं। कोई मानेगा इसको की , बलात्कार उसका भी होता हैं।  कोई नहीं करता विश्वास।  पर वो हैं छुपारुस्तम , खुद चुपहोके दुसरोको नहीं करता उदास।  झाक्के देखो कभी उसमे , जो जल्द सुबहसे देररात तक दफ्तरमे होता है।  झाक्के देखो कभी उसमे, जो साठ का होके आठकी हरकते करता हैं।  झाक्के देखो कभी उसमे, ...

Tilak Lagana Jaruri Hain ( तिलक लगाना जरुरी हैं। )

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तिलक लगाना जरुरी हैं।  .  दस हो या करोड़ो वहा।  महल हो या  सिर्फ झाड़ वहा।  तंग गलियां हो या  बड़ी सड़के वहा।  सबको-अपना  अधिकार पाना , और... कर्तव्य निभाना जरुरी हैं।  इसलिए , तिलक  लगाना जरुरी हैं।  तिलक  लगाना जरुरी हैं।  ये तो मेला हैं अलग-अलग चिन्होका। रंगमंच सजता हैं , राजनीतके कलाकारोंका।  उस रंगमंच का मूल चुकाना जरुरी हैं।  इसलिए , तिलक  लगाना जरुरी हैं।  तिलक  लगाना जरुरी हैं।    डरते न वो कोई गोलीसे। डरते वो सिर्फ और सिर्फ , हमारे बीच एक-दूसरेके लिए  अच्छी बोलीसे।  इन् बारूदी काली फसल उगाने वालोको , कुछ अच्छे पाठ पढ़ना जरुरी हैं।  इसलिए , तिलक  लगाना जरुरी हैं।  तिलक  लगाना जरुरी हैं।  आरक्षण को  मत की तिजोरी समझनेवाले हो या , देशकी तिजोरीमे  छेद करके , खुद्की तिजोरी भरनेवाले।  उनको उखाड़ फेकना जरुरी हैं।  इसलिए , तिलक  लगाना जरुरी हैं।  तिलक  लगाना जरुरी हैं...

Sukunse ( सुकूनसे )

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सुकूनसे सुगंध आ रही है आज-कल थोड़ी थोड़ी , इस रेगिस्तान मे किसी फूल से।  सूंघलू उसे मैं जो थोड़ा , तो कर जाती है अलग हमको हमहींसे।  देखा तो था एक बार ! हा …देखा तो था एक बार ! लग रही थी नन्हीसे कली, सोचा न था हो जाएगी इतनी सुन्दर , जैसे दिखती है वो मोरके पंखसे। हुस्न का दिदार तो होते ही रहता है दूरसे।  पिया करते है हम मटकीसे पानी , बिना छुए उसे …और बिना किसी के डरसे।  शर्त मत लगाना कभी !! नहीं …शर्त मत लगाना कभी !! डरते नहीं है हम कसी भी आपके शर्तसे।  नहीं तो बोलना पड़ेगा हमे नाम हुज़ूरसे।  क्यु ? लग गया न धक्का ज़ोरसे। ऐसे यार ना होते अगर , तो हम बात भी करलेते सुकूनसे।  सच कहु मैं … तो पेहेले बार महसूस कर रहे हैं हम खुदको मैदान मे कमज़ोरसे।  मार डालूँगा तुम्हे …हा मार डालूँगा तुम्हे  जो बात की तुमने इसकी किसी औरसे।  ये बदला समां क्यों लगरहा है, कहा से आ रही है ये रौशनी ? ये क्या देखतो नहीं रहे हम भूलसे।  ओए !! उठजा प्यारे , तू खूब सो लिया सुकूनसे।      खूब सो लिया सुक...

Ye Silsila...(ये सिलसिला..)

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ये सिलसिला… ये सिलसिला चलताही जाएगा।  ये तुझे सुबह सबसे पेहेले देखने का ख़्वाब, हररोज़ बढ़ता ही जाएगा। ये तेरे बात करने का तरीका वक़्तसे वक़्त तक बदलता ही जाएगा। पेहेले बात … पहेली मुलाकात तो अबतक याद है, हमने बो दिए थे बीज।  हम तो डाल रहे थे पानी, बना रहे थे नाते।  अब लगता है उन्ही पानीसे, उग रहे है काटे।  कही इन् काँटोंके पीछे दूरिया तो वजह नहीं ? फर्क तो सिर्फ नज़रियों का है। खुदको पूछोगे तो मिलूँगा वही। नहीं तो फिर सामने भी रहु अगर , तो दिखूँगा नहीं। कही इन् के पीछे , ये खून के नाते वाले तो नहीं। देखो क्या दिन आगया है, की इन् खून के नाते वालो को 'रिश्तेदार' कहते थे हमही। क्या इनके पीछे रिवाज़ों का फर्क नहीं? हंसी आती है अबतक! इक्कीसवी सदी मे हम है।  पर अब भी कुछ लोग कर रहे , तू-तू और मैं-मैं।  क्या इनके पीछे हैं आगे की सोच ? डरना मत इससे ये तोह है छोटीसी बात।  मेरी तो बस ये हैं सोच , की इन् पैरो मे चलने के लिए , और इन हाथो मे तुझे पकड़ने के लिए, कभी न आएगी मोच। फिर भी ...

Ek Samay...(एक समय...)

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एक समय… एक समय होता था।  जब हम जैसे मिटटी को , उन्होंने मटको मे घडोया था।  जब माँ-बाप और परिवार के सिवा , हमने और कुछ ना पाया था।  एक समय आया था।  जब हम जैसे किसीको , हमने दोस्त बनाया था।  होता वो हमारे पास ही , कितना भी उसको हसाया या रुलाया था।  और , अब एक समय आया हैं।  की शायद 'दुरीसे' दोस्त तो छोडो , कोई तो कभी-कभी परिवारसे भी, विश्वास न बना पाया है।  दिन भर बस खुदको, बुरे खयालो मे पाया है।  जागे हो फिरभी , खुदको अंदरसे मरा पाया है।  जैसे धुपके उजालेके बीच , बडासा काला बादल , अँधेरा करने आया है।  जल्द ही !! एक समय आएगा।  जब यही काला बादल ऊपर हो, और कोई अपना कोई प्यारा हाथमे दीपक थमा जाएगा।  ये अपना कोई प्यारा वही है , जो तुमको ये पढ़कर दिमागमे , सबसे पेहेले आएगा।  और वोही पूरा अँधेरा उजालेमे बदल के , होठो पे मुस्कुराहट दे जाएगा।  एक समय आएगा। एक समय आएगा।               ...

Thandi Hawao Ki Dhul...(ठंडी हवाओ की धूल...)

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ठंडी हवाओ की धूल... इन् ठंडी हवाओ ने धूलको उड़ाके , कुछ बातो की याद दिलाई।  जैसे … जैसे थी वो मेरे करीब आयी।  और शर्माके नज़र झुकाई।  उसने फिर मेरे साथ , रोज़ जैसे,शाम बिताई। पर एक बात उसने मुझे कभी न बताई। थी दिक्कत उसे सास लेनेमे। पर अच्छा लगता था उसे, मेरे साथ रहनेमे। फिर …फिर क्या ? फिर ग्रहण आया उसपे कही।  थी वो बिस्तर पे , पर घर के नहीं।  सुईया  लगी हुई हाथो मे जैसे , जैसे …काँटे लगे हो गुलाब मे कही।  कहा उसने , "माफ़ करना।  हर दुआ मे याद रखना। मैं ज्यादा बाकी नहीं।  पर रखना मुझे तुम्हारे दिल मे कही।" सुना उसने , "जनाब  …क्यों नहीं ?" अगले दिन वो उस शरीर को बाकी सबके लिए छोड़ गई।  पर  … पर मुझे इन ठंडी हवाओ के धूलमे मिल गयी। इन ठंडी हवाओ के धूलमे मिल गयी।                                                                   ...

Beti...Ye Hain 'Ghar Apna'(बेटी…ये है 'घर अपना')

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बेटी…ये है   ' घर अपना' बेटी … खूब तुम रोना , खूब तुम हसना।  हसने और रोनेसे की आवाज़ ही तो, घर 'लगता' हैं अपना।  खूब तुम बिखेरना , खूब तुम समेटना।  बिखेरने और समेटनेसे ही तो, घर 'बनता' है अपना। खूब तुम खाना, खूब तुम गिराना। खाने और गिरानेसे ही तो, घर 'भरता' है अपना। खूब तुम दौड़ना, खूब तुम कूदना। दौड़ने और कूदनेसे ही तो, घर 'सजता' है अपना। खूब तुम चलना, खूब तुम रुकना। चलने और रुक्नेसे ही तो, घर 'आगे बढ़ता' है अपना। खूब तुम जागना, खूब तुम जगाना। जागने और जगानेसे ही तो, घर 'सावधान होता' है अपना। खूब तुम पढ़ना, खूब तुम लिखना। पढ़-लिखकर ...घर का नहीं ! पर नाम उँचा करना खुदका अपना। और कुछ नहीं चाहिए बस … खूब तुम रोना, खूब तुम हसना। बेटी … जिसभी घर जाओगी, घर लगेगा अपना।                                            -संकेत अशोक थानवी ॥३०/अप्रैल/१४॥