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रास्ता (Raasta)

रास्ता किसी और के तराज़ूमें , खुदको मत तोलना।  रास्ता पता होकरभी चलना कैसे इसपे? खुदको है टटोलना ।  धोकेदार मोड़ कई सारे , बड़े गतिरोधक कई सारे , युही ना रुकले । बनो ऐसा की कांटे को छूकरभी , खून ना निकले।  भूलना मत इस सबमे आस पास देखना, कोई भी सड़क पूरी खाली नहीं होती।  एक ज़िन्दगी सिर्फ दो आखो की कहानी नहीं होती।  डूबता सूरज पीछे छोड़ने की ख़ुशी माना रहे हो तुम।  दरअसल, खुदकी परछाई का पीछा कर रहे हो तुम।  जैसे असत्य सत्य का , अंधकार उजाले का प्रमाण।  तू युही उदास ना हो चलते हुए , क्योंकि वो तेरे ख़ुशी का प्रमाण।  - संकेत अशोक थानवी ॥१४/२/१७॥ 

खाब मुझे देदो ( Khaab mujhe dedo)

खाब मुझे देदो अच्छी यादे तो सबको बता पाऊ, बुरी यादे बताकर रो पाऊ ऐसा कन्धा मुझे देदो।  बोलते रहने की जरुरत नहीं , चुप होके भी  शान्तसे रस्तेपे साथ चलने वाला यार मुझे देदो।  चाँद नहीं बनना मुझे , उसके बगलमे छोटेसे तारे की जगह मुझे देदो।  दोस्त की आशा नहीं , हमेशा साथ बैठे खंजर रखा हुआ दुश्मन मुझे देदो। उदास होने की बात नहीं ये, ये जो समझ पाए ऐसा सागर मुझे देदो। क्या थोड़ा भी जानते हो मुझे ? ऐसे खाब को हकीकतकर  मुझे देदो।   - संकेत अशोक थानवी ॥११/२/२०१७॥  

Amavas ( अमावस )

अमावस  ए अमावस ! क्यों उदास होता है ?  वो हसीं चाँद को रात का आराम भी तू ही देता है।  ज़िन्दगी मे छोटी छोटी खुशिया अहम् है।  तू ना होता तो इन् तारो की किमत ही क्या थी ? दूसरे की चमक को बढ़ावा देना इतना आसान नहीं।  तेरे साथ दिवाली युही नहीं मानते।  देख तेरा खुमार चाँद पर कितना छाया।  पहले १५ दिन तुझसे बिछड़ने की यादमे, और फिर १५ तुझसे मिलने की आस में मरता है।  तेरा प्यार समझना मुश्किल है।  ईद के चाँद का दिदार इतना हँसी युही नहीं होता।  - संकेत अशोक थानवी ॥ १५/१२/१६ ॥

Vartalaap(वार्तालाप)

वार्तालाप  अ : क्यों दिखता नहीं तुझे अपनी खुदकी ज़िन्दगी के पार।  कही स्वार्थ से जुड़े तो नहीं इसके तार।  नादानी , प्यार , दोस्ती और दुश्मनी जैसी बाते है काफी सरल।  मुश्किल बना दिया तूने , खुद्दारी में होके मगन।  खुदकी किताब तुम खुद रंगते हो, इसे सुन्दर बनाना ।  कोई भी धब्बा एक पन्ने पर नहीं रुकता , क्या पता फिर ना मिले पछताने का बहाना।  झरने की आवाज़ , फूल की खुशबू , फल की मिठास ,तारो की टिमटिमाना  और हवा का कोमल स्पर्श , सब सामान है ये।  भेदभाव ना कर किसी में भी , बुद्धि और इंद्र्यियो का क्या सही उपयोग है ये ? सबका भला चाहता हूँ मैं  , इसीलिए शायद परमात्मा।  मेरा ही नाम बेच बेच कर , तूने किया भलाई का खात्मा ।  - संकेत अशोक थानवी ॥११/१०/२०१६  ॥  ब : मेरी मनो तो स्वार्थ से कोई आत्मा न बच पाई।  तुम्हारा स्वार्थ शायद इस दुनिया का भला , मेरा खुदकी कमाई।  ये प्यार आदि को मैं नहीं मानता।  इसी अविश्वास को जग खुद्दारी से जनता। रुकी कलम को चलाने ...

Nazariya (नज़रिया)

नज़रिया इस झुग्गी से मेरे ख्वाबो की इमारतों की सबसे ऊँची मंझिल देख रहा हूँ। डर लगता है साहब , हर एक मंझिल चढ़नेपे थोड़ा और बिक रहा हूँ। क्या होती नहीं जगह अपनेपन की वहा। सब कहते है बोहोत खूबसूरत है , लेकिन होते है खोखलेसे ये महल जहा। राजघरानो से जश्न वहां होते है क्या ? जश्न जो मेरे घर को ख़ुशी ना दे, उस जश्न का अर्थ ही क्या ? फिर भी इच्छा है इस अंदरूनी दानव की वहा जानेकी। ना है उसके पास कोई शर्म, उसे तो ख़ुशी चाहिए इस झुग्गी को उस उंचाईसे छोटा देख पानेकी।  इस मामूली छोटी झुग्गीसे वो उंचाईभी छोटी दिखती है।  ताक़त ऊंचाई में नहीं , नज़रिये में होती है।  -  संकेत अशोक थानवी ॥ २८/०८/२०१६ ॥ 

Khudko zinda bana...(खुदको ज़िंदा बना..)

खुदको ज़िंदा बना इन् झूटी आकांक्षाओं , इन् झूटी अहसासों  को सच समझने वाले।  तेरी ज़िन्दगी का मतलब क्या ? जवाब तेरे पास है नहीं  , मुझे पता है।  ये सिर्फ तेरी  हालत नहीं , दुनियामे शायद ही इससे कोई  बचा है।  याद कर वो सारे अनोखे ख्वाब , जो तूने देखे थे बचपनमे।  बुनता था तू एक नया ख्वाब , हर एक धड़कनमे।  अगर पुछु तुझसे की इसमें दोष किसका है तू काम को दोष देगा।  लेकिन पेट वही भरता है , ये भी तू कहेगा।  हकीकत है ये , गलत नहीं।  लेकिन काम को ज़िन्दगी बनना , ये भी तो सही नहीं।  ज़िन्दगी को बनाओ वो किताब , जिसके हर पन्ने हो नए रंगका।  हर वाक्य हो नयी बात।  एक ऐसी किताब, जिसको आनेवाले अपनाए।  नाकी वो , जिसको सब भूतकालमे दफनाए।  इसकेलिए उस भ्रम के बादल को हटा।  खुदकी किताबमे जरा धूल हटा के , खुदको ज़िंदा बना।  - संकेत अशोक थानवी ॥१५/०७/२०१६ ॥ 

Safar(सफर)

सफर  ये सफर हम दोहरयगे बार बार।  याद करेगी ये आँखे इन् लम्हों को ज़िन्दगी के पार।  सिर्फ उफनती लहरें याद रहती है किसी नदी के बहाओ मे।  हड़बड़ाहट के लम्हे बच जाएंगे हमारी धूल खाती किताब मे।  मिलेंगे तुझे कई उलझे मोड़ रस्ते मे तेरे।  पूछना तो पड़ेगा की किस रास्ते है मेरी मंझिल दोस्त मेरे।  गिने चुने दिन का सफर ,समय ज्यादा नहीं।  सबकुछ करने के बिच बोहत छूट न जाये कही।  बदल जाता है रिश्तों का पैमाना। फिर भी याद रखना सिर्फ एक दूसरे का हसाना।  शांति के लिए बेचैन होने की जरुरत नहीं राह मे।  सफर के मझे लेलो तुम मंझिल के इंतज़ार मे।  - संकेत अशोक थानवी ॥ २६/०३/१६ ॥