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कहानी (Kahani)

कहानी (Kahani) मेरे ज़िन्दगीकी अमावस की रातमे, मैं भाग रहा खुदसे जैसे बैठा हूँ कोई ट्रैन मे। ज़िंदगी की खिड़कीपे बैठा , देख रहा आसमान को। सिर्फ एक मामूली टिमटिमाता ध्रुवतारा नहीं तुम मेरे लिए, बल्कि सारे तारे जोड़ बनाते है तेरी हस्ती-मुस्कुराती तस्वीर को। येही तो अब बचा है , जो बदलता नहीं समयके साथ कभी। मेरे इस चक्कर खाती जिन्दगीका तुमवो स्थिर बिंदुहो , जिसको देखता हूँ तो चलनेमे डगमगाता नहीं कभी। मेरे ख्वाबोकी तुम हो रानी , और मैं हूँ नवाब। ये अमावस की रात भी हो गयी नूरानी। लिखते वक़्त ये कागज़ जैसे हो तुम्हारा हाथ , और ये कलम एक गुलाब। ये तुम्हारा हाथ लेकर मैं उसपे गुलबसे रंगदु एक कहानी।   -  संकेत अशोक थानवी ॥३०/१२/१५॥ 

बच्चा(Baccha)

बच्चा(Baccha) मोरका पंख देखा है कभी? कितना सुन्दर , कितना नाजुक  और कितना रंगीन।  कुछ ऐसाही था मेरा बचपन।  नहीं पता था क्या होती कमी।  आशाओका था मैं धनी।  नहीं पता था भूक-चोट को छोड़के , क्यों आती थी बड़ो की आखो मे नमी।  क्यों हस रहे हो ? इसका जवाब न होता कभी।  कोई किसेभी डाटे अगर जो घरमे , आता मुझे अपने आखोंका नल बहाना।  मुझे तो नहीं आता था , किसी डरपोक बिल्ली को भी भागाना।  ना थी कोई योग्यता मित्रताकी , गुड्डा-झाड़ू-ऑटो भैया अन्य सब से थी मेरी दोस्ती।  दोस्ती का मतलब नहीं पता था तब , लेकिन नहीं थी आज जैसी किसीसे मतलबी दोस्ती।  अगर एक छोटे बच्चेकी मासूम-मुरतके सांचे मे डालोगे पूरे दुनियाकी शोहरत को पिघलाके , ना भर पाओगे उसके पैरोकी छोटी ऊँगली।  समझ जाओगे वो बच्चा कितना दिव्य, और ये दुनिया कितनी धुंदली।  - संकेत अशोक थानवी ॥२६/१२/२०१५ ॥  

सच (Sach)

सच (Sach) पता है मुझे कुछ राज़ है तुझमे।  उस हंसी के निचे कोई बात है खुदमे।  सच छुपाना , खुदमे छुरी घुसाने बराबर।  छुरी न निकले , तो खुदको खुदही मारने बराबर।  तुम किसी एक को हर एक सच क्यों नहीं बोलते।  बताते क्यों नहीं की तुम किसीपे भी इतना विश्वास नहीं करते।  बोलके देखो मुझे , न करना पड़ेगा कुछ हिम्मत जुटाने के लिए।  एक बात बतादु तुझे ,  मै किसीको गलत समझता नहीं कोई बात बताने के लिए।  बोल्दो जो बोलना है , खुदमे खुदको रोका नहीं जाता।  चुप रहकर क्या बोलोगे तुम , कुण्डी लगाकर दरवाज़ा खोला नहीं जाता।  अजीब लगेगा ये पढ़के तुम्हे , पर हे ये भी सचही।  ये तो सच का छुरा निकल रहा मुझसे , छुरा निकलने वाले तुम्ही।  - संकेत अशोक थानवी ॥१५/१२/२०१५॥ 

क्या समझाओगी ?( Kya Samajhaogi? )

क्या समझाओगी ? तू है कितनी खूबसूरत , तुझे न पता।  हो गई धड़कन क्यों तेज़ इतनी , मुझे न पता। मतलब कब समझोगी तुम मेरी कविताओ का , मुझपे जादू हो गया इन नशीली अदाओँका।  अँधा कर दिए तुमने।  अँधेरे से नहीं , चेहरेसे। जब -जब आती हो सामने , हो जाती हो सुन्दर पहलेसे।  किसी जवानको महसूस होता है बुढ़ापा,  किसी बूढ़ेको महसूस होती है जवानी। दोनों मे बस फर्क इतना है , की दूसरेके हाथ मे है मनचाहा हीरा, पहले के आखो मे है कोई तस्वीर सुहानी।  ये हो रहा मुझे क्या , कोई तो बताओ।  ये अँधा शायद बढ़ रहा खाई तरफ , कोई तो रुकाओ।  कहावत है , की समय के सामने कुछभी नहीं टिकता।  लेकिन मुझे , मुझे तुम्हारे साथ मे 'समय' इस शब्द का अर्थ नहीं दिखता।  खुदा जाने खुदमे इतना क्या गुरुर है।  अँधा तो पहले हे कर दिए तुमने। लेकिन अब होता अच्छे रूप रंगसे ज्यादा अच्छे  स्वभाव से सुकून है।  ज्यादातर दुखोकी वजह सिर्फ नज़रिये का फर्क है।  तुम जिसे देखो , वो तुम्हे कैसे देखे ? हकीकत होती...

दान (Daan)

दान (Daan) मनालो तुम खुद्की दिवालीसे पहले किसीकी दिवाली।  देदो तुम किसीके चेहरे पे खुशहाली।  आतिशबाजी नहीं होती इसमें , न बनाते है इसमें कोई रंगोली।  दिखती है इसमें तो दिलो की अमीरी।  बनालो तुम किसी अंजानको , बिना मिले अपनोसा करीबी।  जो दुसरो की मदद करे , वही तो होता इंसान है। सब भूल गए शायद , जिसे हम कहते दान है।  क्या होता है दान ? दान नहीं कोई लेख जो लिखा हो संविधान मे।  और ना हे वो कोई वस्तु जो मिलती हो इनाम मे। इसके होते अनेको रूप है , करो तो मिल जाएगा इसके विराट रूप का प्रमाण।  दान तुमसे किसी अजनबीको दिया गया एक अदृश्यसा वरदान। - संकेत अशोक थानवी ॥०८/१०/१५॥ 

दौड़ (Daud)

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दौड़  देख! देख! देख! देख! कितना नाराज़ है। खुदको ही आक कम, कितना लाचार है। बुरे सोच की, ये उंगलिया जो ताकती। बड़ा तू खुदको मान को, जो उंगलिया वो काटती। दौड़... दौड़ है ये, भाग तू। इस बातको न नकार तू। रुकना मत, या आगे हार है ये। शुरवात कर, या अभीसे मात है ये। मुकाम नहीं, ये एक कदम है। जशन नाकर, ये सब भरम है। चाहिए अब आराम और ज़िन्दगी खस्ती, या अभी तप और आगे ज़िन्दगी हस्ती। देखले चारो तरफ, है विकल्पों का घेरा। सोचले मानव, चुनाव है तेरा। जंग जैसा है ये, लेकिन जीवन का दाव है। इसमें बाज़ी ना लगाने से बेहतर खाना घाव है। दौड़ले,  तुझे मिलेंगे आगे कई अच्छे - बुरे पड़ाव है। -संकेत अशोक थानवी ॥२६/०९/१५ ॥  Photo by  Kunj Parekh  on  Unsplash

जूनून | Junoon

जूनून Dedicated to  BITS Pilani, Pilani Campus Junoon Sports Event for Specially-abled. ये हौसला है मेरा, कमजोरी नहीं। मुझे चूमना है उस चोटी को, जिसके दूर निचे बादल हो कही। ये मेरी रोज़ की मामूली जंग है. तुम्हारे लिए ये जैसी विश्वयुद्ध की पुकार। जीभ नहीं तो क्या, मुझमे में हैं सिंह की ललकार। ये जो विश्वास का बाँध भर रहा, देखना मुझे खुद को महान।  तुम लोग जैसे चल नही सकता तो क्या, मुझे में हैं गरुड़ की उड़ान। ना समझना की मुझमे कोई कमी हैं । तुम्हारी थाली भरी होने के बाद भी तुम्हे भूक नहीं हैं ।  ये जूनून हैं मेरा, मेरी मज़बूरी नहीं हैं । - संकेत अशोक थानवी ॥ १२/०९/२०१५ ॥