सपनो का सागर(Sapno ka sagar)

सपनो का सागर

आया इस आखरी मोड़तक कई दफा,

पहले बार इतना निहार रहा। 
पेड़ो से भरे इन् गलियों को दूर जाते देख मै, एक जम्बूरा,
अपने यादो के वनमें इनके अंकुर सवार रहा। 


मेरे जैसे रोज़ कितने जाते होंगे,
ऐसे खचाखच भरे डुगडुगाती गाडीमें फसकर!
शहरमें भरी थाली के सपने पुरे करने चले,
गाओंके दो वक़्त की रोटीमें से अपना-अपना हिस्सा लेकर। 


बचपनसे लेकर अभी स्टेशन तक सुन रहा,
की उस शहर में विशाल-अनंत सागर है, सपनोका। 
थोड़ी दिक्कत... और ज़िन्दगी भर आराम की मछली का सुख वाहा,
इन् सपनो के मछवारोंसे भरी ट्रैन में,
अपना मिलकरभी नहीं लगता अब परिचितसा। 

उतरा नहीं मै, स्वागत किया मेरा शहर के इस बड़े प्लेटफार्म पे,
किसी छोटे दिलवालेने धक्का देकर गिराके।
जैसे तैसे बहार निकलकर देखा मैंने कुछको,
खुदके बनाये, शायद झूठे, बादलोमे उड़ते। 
सालो तक नज़रे टिकाके नावमें बैठा,
इन् बैगोके वजन से नहीं लेकिन,
आशाओ-आकांशाओ का ये बोझ उठाके।

चिढ़कर कूदा मै उस मछली की झलक के लिए,
काफी निचे जाकर मछली आराम की मिली मुझे हसते हुए। 
वो मौत थी,
मेरे जैसे ही इस अंधेर गहरे सपनो के सागरमें डूबते हुए।

- संकेत अशोक थानवी || १ /६/२०१७ || 


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